Tuesday, 22 July 2014

प्रणय स्पर्श


























तेरी चाहत ने आज फिर से मुझे जगा दिया,
एहसास का दीप, फिर क्यूँ तूने जला दिया,
छुपा रखा था मैंने, खुद को एक ज़माने से,
आज तूने क्यों फिर मुझे रुला दिय…

तेरी चाहत ने आज फिर से मुझे जगा दिया,

स्थिर थी मैं, ठहरे हुए पानी कि तरह
पत्थर मार, क्यों इन लहरों को प्रवाह दिया,
क्यों फिर से मुझे, महसूस हुआ मेरा अस्तित्व ,
मैं - मैं भी हूँ, क्यों मुझको याद दिला दिया

तेरी चाहत ने आज फिर से मुझे जगा दिया,

सपना था, कि मुट्ठी में होगा अब आसमां,
ऐसी अतिश्योक्ति को क्यों फिर तूने हवा दिया,
तेरी फूंक ने चेहरे से, उड़ाया था जो ज़ुल्फ़ों को,
ऐसा वज्र क्यों मुझे पर आज गिरा दिया..

तेरी चाहत ने आज फिर से मुझे जगा दिया,

कल तक था तू इस मर्म का मेहमान
आज क्यों तूने इसेअपना घर बना दिया,
भ्रम था मुझे, मेरी अनम्यता  का ,
क्यों तूने मेरे भावों का बोध करा दिया,

उम्मीद का पैमाना आज फिर तूने छलका दिया,
तेरी चाहत ने आज फिर से मुझे जगा दिया,