Thursday, 8 June 2017

यादें दोस्ती की : एक सहपाठी


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तेरे साथ नहीं अब सालों से,
पर तू दूर नहीं कभी ख्यालों से,
तू है बचपन की सखी-सहेली
बुझाई है साथ, बहुत पहेली


क्या दिन थे , जब हम बच्चे थे
थोड़े अक्ल के कच्चे थे
फिर भी दिल के सच्चे थे।
चल आज मिलें उस बचपन को,
कहें, रुक आने दे पचपन को
चल मिलें उन हँसते चहरों को,
चल मिले उन ठहाकों की लेहरों को।।


चल बैडमिंटन कोर्ट में, मुझसे इक बार हार के दिखा
चल खेले ping- pong फिर से,
और हर बार मुझसे जीत जा,
फिर बन जा मेरी डबल्स की पार्टनर,
सिंगल में मुझे cheer-up करा
चल ground के चार चक्कर लगा
चल थोड़ा warm-up होजा,
चल आज फिर से hooting करें,
GTB per shooting करें
फिर होजाये आमना-सामना ,
चल आज stage पर debate करें
या फिर कोई duet करें
चल फिर से compitition fight करे ,
एक -दो-एक, left right करें
चल आज फिर से camping करें,
स्कूल में long jumping करें
उसकी चुगली टीचर से करे,
चल इसकी कानाफूसी करें,
चल फिर से एक सेटिंग करें
वो किसकी होगी, betting करे
चल exam की तैयारी tight करे
सब कुछ एकदम set right करे
चल कुछ IMP share करे,
वो  sweet pain bare करे
चल फिर आज उसको roste kare
और एक दूजे को boost करे
चल आज मिलें उस बचपन को,
कह दे, रुक जा उस पचपन को।

School Days 2002-03

वापसी


beautiful romantic couple love sad alone wallpapers (7)

कुछ ख़ास है तुझमे, जो मुझमे नहीं
कुछ बात है तुझमे, जो मुझमे नहीं
ज़माने बीत गए, नज़रों की चमक वहीं 
फ़साने बीत गए, तेरी दमक वही 
फिर खो न जाना तू उन नकाबों की भीड़ में
है जो हिम्मत तुझ में , वो मुझमे नहीं।।

Saturday, 18 March 2017

बीत गयी वो भोर

Woman Accepts Christ After 'Pleasant' Atheism

फिर वो भोर देखनी है
किरणों से घर रोशन होता था
जब कोयल राग सुनाती थी
कू-कू करके बच्चे उसके पीछे-पीछे गाते थे
वो अम्मा मंदिर से आती थी
और सुबह-सुबह ही जंगले से 
सबकी राम-राम हो जाती थी
चिरैया और गिलहरियाँ साथ कलेवा खाती थी
चूँ-चूँ  चीं-चीं की बातें मन को लुभाती थी
छकलते हुए  पानी की आवाज़
एक ऊर्जा मन में दे जाती थी
वो पानी में सूरज की किरणें
सब सोनेसा कर जाती थी
पत्तों पर जब ओस की बूंदे
मोती सी दिखलाती थी
छत पर वो पेड़ो की छांव में 
फुर्सत के पल बिताती थी
प्रेम से गुदगुदाते पल
कागज़ पर उकेर जाती थी।
फिर वो भोर देखनी है।

Thursday, 9 February 2017

बहुत याद आती है



माँ तू बहुत याद आती है,
तवे से उतरती रोटी हमें खिलाती है,
और खुद ठंडा निवाला खाती है
माँ तू बहुत याद आती है,

सोती नहीं रातो को,
और हमसे पहले उठ जाती है
थकी हुई आँखों से भी,
सिलती कपड़े , बेटियों को सजाती है
माँ तू बहुत याद आती है

अपने सपनों को तोड़
हमें नींद से जागती है,
और हमारे सपनो को पूरा करने में
अपनी जी-जान  लगाती है
जाने तेरी कितनी ख़्वाहिशें 
सूली पर चढ़ाती है,
फिर हँसते हँसते हमसे कदम मिलाती है
माँ तू बहुत याद आती है

छोटी थी तब डरती थी
कहती कुछ, कुछ करती थी 
जब तू गुस्से से लाल होती थी,
अब सहेली बन जाती है,
माँ तू बहुत याद आती है

जब तबियत ढीली होती है,
बस आँखें सीली होती है,
दुखती हुई रग् ,कोई बूझता नहीं,
तुझे याद कर लूं और कुछ सूझता नहीं
कोई दर, मंज़िल मुझे भाती है,
बस तू ही तू ज़हन में रह जाती है
माँ तू बहुत याद आती है।