Thursday, 9 July 2015

कुछ अनकही यादें - आखों में हम खूब काजल लगाते....



आखों में हम खूब काजल लगाते,
फिर उन आखों से तुम्हें डराते,

चहरे पर कभी लाली न लगते,
नहीं तो तुम प्यार हमें, कैसे कर पाते 

कानों से बाली को रोज़ हटाते,
ताकि तुम उन्हें बार-बार पहनाते 

हाथों की चूड़ियाँ , इतनी खनकाते  
इस तरह तुम्हारा ध्यान , अपनी  ओर खींच  लाते 

चेहरे को अश्कों से रोज़ नहलाते,
ताकि हमारे आसूं भी मोती कहलाते 

अब तो बस यादों में खो जाते,
उस चादर में , सिमट कर सो हम जाते,

जो, तुम्हारी खुशबु से हमें अब भी महकाती है,
 तुम साथ हो मेरे, ये एहसास कराती है । 

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