Friday, 9 October 2015

अधर्म - धर्म

अधर्म हम इतना फैला रहें हैं,
कुछ इस तरह हम अपने-अपने धर्म को बचा रहे है

   गौ माता की रक्षा की बीन बजा रहे है,
  और अपनी माँ को ही घर से भगा रहे है
  कुछ इस तरह हम अपना- अपना घर्म बचा रहें हैं

 आतंकवाद से बचाने की गुहार लगा रहे है,
और आतंकवादी के जनाज़े में कन्धा देकर आरहे है,
कुछ इस तरह हम अपना-अपना धर्म बचा रहे है

  चंद पानी के छीटों को ईश्वर की पहचान बता रहे है,
  रोटी के लालच में, गरीब का धर्मान्तरण करा रहे है,
  कुछ इस तरह हम अपना- अपना  धर्म बचा रहे है,

 आरक्षण  की मांग में, शहरों के धुँए उड़ा रहे है,
और समानता के अधिकार का रोना गा रहे है,
कुछ इस तरह हम अपना- अपना  धर्म बचा रहे है,

   अधर्म हम इतना फैला रहें हैं,

  कुछ इस तरह हम अपने-अपने धर्म को बचा रहे है