Sunday, 17 April 2016

अधूरा - सा लगता है




तुझ बिन सब अधूरा - सा लगता है
तू हो तो मन मेरा पूरा- सा लगता है
किसी किसी बहाने से, कोई पुकारता नहीं,
आखों से तकरार अभी होती नहीं,
गुस्से से प्यार कोई करता नहीं,
झगडे और नोक-झोक में खोती नहीं,
झूठ-मुठ का गुस्सा अभी होती नहीं,
तेरे बिन मेरे दिल को थोड़ा बुरा- सा लगता है
तकिये के गिलाफ़ पर, सिलवटें नहीं,
चादर भी कोई अभी खींचता नहीं,
रातों को उठ-उठ कर मुझे देखता नहीं,
करवटों की आहटों से नींद खुलती नहीं
इन्ही यादों में अब आँखें बंद होती नहीं
मेरा ये कमरा भी कोरा-सा लगता है
सुबह- सुबह उठने को मैं सुनाती  नहीं,
अखबार की तहें भी अभी खुलती नहीं,
दिन-भर की कहानियाँ किसी को बताती नहीं,
हर-पल की बाते, किसी को सताती नहीं,
मन से तेरी यादें कहीं जाती नहीं,
तेरे बिन चाँद भी तारा सा लगता है

तुझ बिन मुझे सब अधूरा - सा लगता है
तू हो तो मन मेरा पूरा- सा लगता है

Tuesday, 27 October 2015

Daksh Sharma, My Rising Star | Proud Moment for family

I can't express my feelings after watching this Video...My Kid is superstar for me (Daksh Sharma) , Great Performance!! It’s just a start for my KID.... I know he will get all the success in vibrant colors .With his sincerity and hard work. Lots and lots love and blessings to my Hero...
I request all my friends to watch this video and appreciate the Rising Star.... Your Comments and Re-sharing will be very much valuable to this kid


Friday, 9 October 2015

अधर्म - धर्म

अधर्म हम इतना फैला रहें हैं,
कुछ इस तरह हम अपने-अपने धर्म को बचा रहे है

   गौ माता की रक्षा की बीन बजा रहे है,
  और अपनी माँ को ही घर से भगा रहे है
  कुछ इस तरह हम अपना- अपना घर्म बचा रहें हैं

 आतंकवाद से बचाने की गुहार लगा रहे है,
और आतंकवादी के जनाज़े में कन्धा देकर आरहे है,
कुछ इस तरह हम अपना-अपना धर्म बचा रहे है

  चंद पानी के छीटों को ईश्वर की पहचान बता रहे है,
  रोटी के लालच में, गरीब का धर्मान्तरण करा रहे है,
  कुछ इस तरह हम अपना- अपना  धर्म बचा रहे है,

 आरक्षण  की मांग में, शहरों के धुँए उड़ा रहे है,
और समानता के अधिकार का रोना गा रहे है,
कुछ इस तरह हम अपना- अपना  धर्म बचा रहे है,

   अधर्म हम इतना फैला रहें हैं,

  कुछ इस तरह हम अपने-अपने धर्म को बचा रहे है

Thursday, 9 July 2015

कुछ अनकही यादें - आखों में हम खूब काजल लगाते....



आखों में हम खूब काजल लगाते,
फिर उन आखों से तुम्हें डराते,

चहरे पर कभी लाली न लगते,
नहीं तो तुम प्यार हमें, कैसे कर पाते 

कानों से बाली को रोज़ हटाते,
ताकि तुम उन्हें बार-बार पहनाते 

हाथों की चूड़ियाँ , इतनी खनकाते  
इस तरह तुम्हारा ध्यान , अपनी  ओर खींच  लाते 

चेहरे को अश्कों से रोज़ नहलाते,
ताकि हमारे आसूं भी मोती कहलाते 

अब तो बस यादों में खो जाते,
उस चादर में , सिमट कर सो हम जाते,

जो, तुम्हारी खुशबु से हमें अब भी महकाती है,
 तुम साथ हो मेरे, ये एहसास कराती है । 

Monday, 16 March 2015

अब तुम आओगे


चाँद को निहारते रात  गुज़र गयी
कि अब तुम आओगे
तारों की झिल-मिल से भी पूछा
कि कब तुम आओगे

पत्ते भी खुसफुसा रहे थे,
मेरे प्यार को पागलपन बता रहे थे
कहा मैंने , दिखा दूँगी सबको,
जब तुम आओगे

हवा भी सरसरा कर हँसी
और कहा... करो इंतजार!!
तुम नहीं आओगे
मैंने भी कह दिया, मुझे है ऐतबार.....

दरवाजों को आजमाया
कही खुल न पाये हो..
उसने इशारा किया..
कही और उनकी न राहें हो

कहा मैंने होगी सबकी शिकायत  ,
जब तुम आओगे....
सबने हँस कर कहा
हम भी देखे ! कब तुम आओगे.........

आगये तुम!! आहटों ने चौंकाया...
ऐसे कई-कई बार मेरा मज़ाक बनाया

खयालों में  कई बार नाराज हुई..
और कई बार तुमने मनाया....
देरी से आने का बहुत बहाना बताया
वादा किया की अब  न कभी मुझे  छोड़ यूँ जाओगे..

सूरज ने रौशन किया सवेरा
रात यूँही निकल गयी
राह ताकि इन आखों ने,
कि अब तुम आओगे,कि अब तुम आओगे