Sunday, 17 April 2016

अधूरा - सा लगता है




तुझ बिन सब अधूरा - सा लगता है
तू हो तो मन मेरा पूरा- सा लगता है
किसी किसी बहाने से, कोई पुकारता नहीं,
आखों से तकरार अभी होती नहीं,
गुस्से से प्यार कोई करता नहीं,
झगडे और नोक-झोक में खोती नहीं,
झूठ-मुठ का गुस्सा अभी होती नहीं,
तेरे बिन मेरे दिल को थोड़ा बुरा- सा लगता है
तकिये के गिलाफ़ पर, सिलवटें नहीं,
चादर भी कोई अभी खींचता नहीं,
रातों को उठ-उठ कर मुझे देखता नहीं,
करवटों की आहटों से नींद खुलती नहीं
इन्ही यादों में अब आँखें बंद होती नहीं
मेरा ये कमरा भी कोरा-सा लगता है
सुबह- सुबह उठने को मैं सुनाती  नहीं,
अखबार की तहें भी अभी खुलती नहीं,
दिन-भर की कहानियाँ किसी को बताती नहीं,
हर-पल की बाते, किसी को सताती नहीं,
मन से तेरी यादें कहीं जाती नहीं,
तेरे बिन चाँद भी तारा सा लगता है

तुझ बिन मुझे सब अधूरा - सा लगता है
तू हो तो मन मेरा पूरा- सा लगता है

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